नीचे दिए गए परिच्छेद में कुछ रिक्त स्थान दिए गए हैं तथा उन्हें प्रश्न संख्या से दर्शाया गया है। ये संख्याएं परिच्छेद के नीचे मुद्रित हैं, और प्रत्येक के सामने (1), (2), (3), (4) और (5) विकल्प दिए गए हैं। इन पांचों में से कोई एक इस रिक्त स्थान को पूरे परिच्छेद के संदर्भ में उपयुक्त ढंग से पूरा कर देता हैं आपको वह विकल्प ज्ञात करना है, और उसका क्रमांक ही उत्तर के रूप में दर्शाना है। आपको दिए गए विकल्पों में से सबसे उपयुक्त का चयन करना है।

मैं क्या था, इस विषय का ज्ञान मेरे मित्रों और (--1--) को बहुत ही कम है। उन्होंने मुझे अनेक पत्र लिखे और उलाहने दिए हैं। वे चाहते हैं कि मैं अपनी जीवनकथा अपने ही मुँह से कह डालूँ। पर पूर्ण रूप से उनकी आज्ञा का पालन करने की शक्ति मुझमें नहीं है। अपनी कथा कहते (--2--) होता है, उसमें तत्व भी तो नहीं। उससे कोई कुछ सीख भी तो नहीं सकता। तथापि जिन सज्जनों ने मुझे अपना कृपा-पात्र बना लिया है, उनकी आज्ञा का उल्लंघन भी (--3--) होगी। अतएव मैं अपने जीवन से संबंध रखने वाली कुछ बातें सूत्र रूप में सुना देना चाहता हूँ।

नौकरी छोड़ने पर मेरे मित्रों ने कई प्रकार से मेरी सहायता करने की इच्छा प्रकट की। किसी ने कहा-‘‘आओ, मैं तुम्हें अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बनाऊँगा।’’ किसी ने लिखा-‘‘मैं तुम्हारे साथ बैठकर संस्कृत पढ़ूँगा।’’ किसी ने कहा-‘‘मैं तुम्हारे लिए छापा खाना खुलवा दूँगा।’’ पर मैंने सबको अपनी (-4--) की सूचना दे दी और लिख दिया कि अभी मुझे आपके सहायता-दान की विशेष आवश्यकता नहीं। मैंने सोचा-अव्यवस्थित-चित् मनुष्य की सफलता में सदा (--5--) रहता है। क्यों न मैं अंगीकृत कार्य ही में अपनी सारी शक्ति लगा दूँ। प्रयत्न और परिश्रम की बड़ी महिमा है। अतएव ‘‘सब तज हरि भज’’ की मिसाल चरितार्थ करता हुआ इंडियन प्रेस प्रदत्त कार्य ही में मैं अपनी शक्ति खर्च करने लगा। जो थोड़ा बहुत (--6--) कभी मिलता तो उसमें अनुवाद आदि का कुछ काम और करता था।

‘सरस्वती’ के संपादन का भार उठाने पर मैंने अपने लिए कुछ आदर्श निश्चित किए। मालिकों का विश्वासभाजन बनने की चेष्टा में मैं यहाँ तक सचेत रहा कि मेरे कारण उन्हें कभी (--7--) में पड़ने की नौबत नहीं आई। सरस्वती के जो उद्देश्य थे, उनकी रक्षा मैंने दृढ़ता से की। एक दफे अलबत्ते मुझे इलाहाबाद के डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट के बँगले पर हाजिर होना पड़ा। पर मैं भूल से (--8--) किया गया था। एक गैर-कानूनी लाॅटरी का विज्ञापन सरस्वती में निकल गया था। उसी के संबंध में मैजिस्ट्रेट को चेतावनी देनी थी। वह और किसी को मिली, क्योंकि विज्ञापनों की छपाई से मेरा कोई सरोकार न था।

मेरी सेवा से सरस्वती का प्रचार जैसे-जैसे बढ़ता गया और मालिकों का मैं जैसे-जैसे अधिकाधिक विश्वासभाजन होता गया, वैसे ही वैसे मेरी सेवा का (--9--) भी मिलता गया और मेरी आर्थिक स्थिति प्रायः वैसी ही हो गई जैसी कि रेलवे की नौकरी छोड़ने के समय थी। इसमें मेरी कारगुजारी कम, दिवंगत बाबू चिंतामणि घोष की (--10--) ही अधिक कारणीभूत थी। उन्होंने मेरे संपादन स्वातंत्र्य में कभी बाधा नहीं डाली; वे मुझे अपना कुटुंबी सा समझते रहे और उनके उत्तराधिकारी अब तक भी मुझे वैसा ही समझते हैं।
Hindi Language For IBPS RRBs-CWE-IV 2015 Exam Preparation
Hindi Language For IBPS RRBs-CWE-IV 2015 Exam Preparation

प्र.1. (1) दुश्मनों (2) हितैषियों (3) विद्वानों (4) आलोचकों (5) संपर्कों

उत्तरः (2) हितैषियों

प्र.2. (1) संदेह (2) भय (3) लाज (4) संकोच (5) गर्व

उत्तरः (4) संकोच

प्र.3. (1) धृष्टता (2) नीचता (3) शत्रुता (4) बुद्धिमानी (5) ईमानदारी

उत्तरः (1) धृष्टता 

प्र.4. (1) कृपणता (2) कृतज्ञता (3) कृतघ्नता (4) निपुणता (5) कुशलता

उत्तरः (2) कृतज्ञता

प्र.5. (1) निश्चय (2) संदेह (3) विश्वास (4) समाधान (5) अभिमान

उत्तरः (2) संदेह

प्र.6. (1) संस्कार (2) दायित्व (3) सम्मान (4) अवकाश (5) वेतन

उत्तरः (4) अवकाश

प्र.7. (1) आवेग (2) शंका (3) उलझन (4) संकट (5) आफत

उत्तरः (3) उलझन

प्र.8. (1) बेइज्जत (2) बदनाम (3) सम्मानित (4) प्रोत्साहित (5) तलब

उत्तरः (5) तलब

प्र.9. (1) बदला (2) तिरस्कार (3) प्रायश्चित (4) कलेवर (5) सम्मान

उत्तरः (1) बदला 

प्र.10. (1) जिज्ञासा (2) उदारता (3) अभिलाषा (4) महिमा (5) अवहेलना 

उत्तरः (2) उदारता
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